Repo Rate: भारतीय अर्थव्यवस्था का संचालक

Last updated on April 8th, 2024 at 10:26 am

भारतीय अर्थव्यवस्था के सुचारू रूप से चलने के लिए ब्याज दरें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन दरों का निर्धारण कई कारकों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है, और उनमें से एक प्रमुख कारक है Repo Rate। यह लेख Repo Rate की अवधारणा, इसके कार्यप्रणाली और भारत की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने में इसकी भूमिका की गहराई से जांच करता है।

Repo Rate को समझना

Repo Rate, जिसे Repurchase एग्रीमेंट (पुनर्खरीद समझौता) दर के रूप में भी जाना जाता है, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा वाणिज्यिक बैंकों को दिए जाने वाले अल्पकालिक ऋणों पर लगने वाली ब्याज दर है। यह दर अनिवार्य रूप से वह दर निर्धारित करती है जिस पर बैंक केंद्रीय बैंक से अतिरिक्त तरलता प्राप्त कर सकते हैं।

Repo Rate का कार्यप्रणाली

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी-कभी, बैंकों के पास ऋण देने के लिए पर्याप्त नकदी नहीं होती है। ऐसी स्थितियों में, वे अपनी तरलता की स्थिति को बनाए रखने के लिए RBI से अल्पकालिक ऋण प्राप्त कर सकती हैं। यह ऋण सरकारी प्रतिभूतियों (government securities) को RBI को बेचकर प्राप्त किया जाता है। ये प्रतिभूतियां अनिवार्य रूप से सरकार द्वारा जारी किए गए ऋण उपकरण होते हैं, जिन्हें बैंकों ने पहले निवेश के रूप में खरीदा होता है।

हालांकि, यह लेन-देन केवल सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री नहीं है। यह एक पुनर्खरीद समझौते के अंतर्गत होता है। इसका मतलब है कि एक पूर्व-निर्धारित अवधि के बाद, आमतौर पर कुछ दिन या सप्ताह, बैंक बेची गईं प्रतिभूतियों को वापस खरीद सकती हैं। इस पुनर्खरीद के लिए ही रेपो रेट का भुगतान किया जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो, रेपो रेट वह ब्याज है जो बैंक RBI को उस राशि पर चुकाती हैं, जो उन्होंने अल्पकालिक ऋण के रूप में प्राप्त की थी।

Rbi Repo Rate

Repo Rate अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है?

Repo Rate मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण उपकरण है जिसका उपयोग RBI अर्थव्यवस्था को वांछित दिशा में ले जाने के लिए करता है। RBI Repo Rate को ऊपर या नीचे करके बैंकों की ऋण देने की क्षमता और व्यक्तियों और कंपनियों की उधार लेने की लागत को प्रभावित कर सकता है। आइए देखें कि रेपो दरों में बदलाव का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है:

  • Repo Rate बढ़ाना: जब मुद्रास्फीति (inflation) बढ़ रही होती है और अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त तरलता होती है, तो RBI रेपो रेट बढ़ा सकता है। इससे बैंकों के लिए RBI से ऋण लेना महंगा हो जाता है। नतीजतन, वाणिज्यिक बैंक उधारदाताओं (borrowers) को दिए जाने वाले ऋणों पर अपनी ब्याज दरें बढ़ा देती हैं। यह बदले में व्यक्तियों और कंपनियों के लिए ऋण लेना महंगा बना देता है। इससे कम ऋण लिया जाएगा, जिससे उपभोग और निवेश में कमी आएगी। हालांकि, इसका सकारात्मक प्रभाव यह होता है कि मांग में कमी से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

रेपो रेट घटाना: अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

जब RBI Repo Rate को कम करता है, तो इसका अर्थव्यवस्था पर कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं, जिनमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों शामिल हैं:

सकारात्मक प्रभाव:

  • ब्याज दरों में कमी: Repo Rate में कमी से बैंकों के लिए ऋण लेना सस्ता हो जाता है। नतीजतन, वे अपने ग्राहकों को कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान करते हैं। यह व्यक्तियों और कंपनियों के लिए ऋण लेना आकर्षक बना देता है, जिससे उपभोग और निवेश बढ़ता है।
  • ** तरलता में वृद्धि:** ऋण की कम लागत बैंकों को अधिक ऋण देने के लिए प्रोत्साहित करती है। यह अर्थव्यवस्था में तरलता को बढ़ाता है, जिससे व्यवसायों और व्यक्तियों के लिए ऋण प्राप्त करना आसान हो जाता है।
  • आर्थिक विकास: उपभोग और निवेश में वृद्धि से आर्थिक विकास को गति मिलती है।

नकारात्मक प्रभाव:

  • मुद्रास्फीति में वृद्धि: कम ब्याज दरों से लोगों के पास खर्च करने के लिए अधिक पैसा होता है, जिससे मांग में वृद्धि होती है। यदि आपूर्ति इस बढ़ती मांग को पूरा करने में विफल रहती है, तो इसका परिणाम मुद्रास्फीति में वृद्धि हो सकता है।
  • ऋण की गुणवत्ता में गिरावट: कम ब्याज दरों से बैंक ऋण देने के मानकों को कम कर सकते हैं। इससे ऋण की गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है, जिससे बैंकिंग प्रणाली के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
  • विनिमय दरों में दबाव: कम ब्याज दरें विदेशी निवेशकों के लिए देश को कम आकर्षक बना सकती हैं। इससे विनिमय दरों पर दबाव पड़ सकता है, जिससे घरेलू मुद्रा का मूल्य कम हो सकता है।

निष्कर्ष:

रेपो रेट अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जिसका उपयोग RBI अर्थव्यवस्था को वांछित दिशा में ले जाने के लिए करता है। Repo Rate में कमी से आर्थिक विकास को गति मिल सकती है, लेकिन इससे मुद्रास्फीति और ऋण की गुणवत्ता में गिरावट का भी खतरा होता है। RBI को Repo Rate को इस तरह से समायोजित करना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में संतुलन बना रहे।

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